मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्याण मंत्री चमरा लिंडा: आदिवासियों के सशक्तिकरण के योद्धा, असम के चाय बागानों से ऐतिहासिक संघर्षों तक

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असम के चाय बागानों में झारखंडी आदिवासियों की दयनीय स्थिति पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और आदिवासी कल्याण मंत्री चमरा लिंडा की पहल सराहनीय है। यह न केवल वर्तमान अन्याय को संबोधित करती है, बल्कि सदियों से चली आ रही आदिवासी शोषण की विरासत को चुनौती देती है। सोरेन की दूरदर्शिता और लिंडा की जमीनी सक्रियता ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, जो आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। सोरेन ने असम के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर एसटी दर्जे की मांग की, जबकि लिंडा के नेतृत्व में 10 दिनों का प्रतिनिधिमंडल दौरा कर रिपोर्ट तैयार की गई। यह कदम झारखंड के आदिवासियों को उनकी जड़ों से जोड़ते हुए न्याय दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक है।

हेमंत सोरेन को ‘आदिवासी योद्धा’ कहा जाता है, और यह उपाधि उनकी अनगिनत पहलों से सिद्ध होती है। उन्होंने ‘आपके अधिकार, आपकी सरकार, आपके द्वार’ योजना शुरू की, जो आदिवासियों के दरवाजे तक सरकारी सेवाएं पहुंचाती है। पेंशन योजनाओं का विस्तार, महिलाओं के लिए ‘मइय्या सम्मान योजना’ के तहत 1000 रुपये की सहायता, किसानों के लिए ऋण माफी और आदिवासी छात्रों के लिए विदेशी शिक्षा की सरकारी प्रायोजित योजना – ये सभी सोरेन की आदिवासी सशक्तिकरण की प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। खरसावन शहीदों के परिवारों के लिए विशेष आयोग का गठन और PESA नियम 2025 की मंजूरी से उन्होंने ग्राम सभाओं को मजबूत बनाया, जो आदिवासियों की स्वशासन की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। सोरेन की राजनीति हमेशा ‘अबुआ राज, अबुआ सरकार’ के सिद्धांत पर आधारित रही है, जहां आदिवासी पहचान और कल्याण सर्वोपरि है। असम के मामले में उनकी सक्रियता से लाखों प्रवासी आदिवासियों को एसटी दर्जा और कल्याण योजनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद जगी है।

चमरा लिंडा, जो अनुसूचित जनजाति, जाति और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के मंत्री हैं, आदिवासी अधिकारों के लिए जमीनी स्तर पर संघर्षरत योद्धा हैं। BIT से ड्रॉपआउट होकर उन्होंने आदिवासी न्याय की लड़ाई को अपना जीवन मिशन बनाया। ट्राइबल फिल्म फेस्टिवल में उनकी भागीदारी ने आदिवासी संस्कृति को वैश्विक मंच दिया, जबकि आदिवासी छात्रों के लिए मुफ्त इंग्लिश मीडियम शिक्षा और NEET-JEE तैयारी में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था उनकी संवेदनशीलता दर्शाती है। लिंडा ने ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल में भूमि विवादों के लिए उप-समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कल्याण योजनाओं को तेज करने के निर्देश दिए। असम दौरे में उनकी नेतृत्व क्षमता ने मजदूरों की पीड़ा को रिपोर्ट में कैद किया, जो राष्ट्रीय स्तर पर न्याय की नींव रखेगी। लिंडा की सक्रियता से साफ है कि वे न केवल मंत्री हैं, बल्कि आदिवासी समुदाय के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

यह पहल पुराने आदिवासी शोषण के मामलों से जुड़ती है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने झारखंड के छोटानागपुर से संथाल, ओरांव, मुंडा आदिवासियों को असम और उत्तर बंगाल के चाय बागानों में ‘इंडेंटर्ड लेबर’ के रूप में ले जाया, जहां गुलामी जैसी स्थिति थी। दूर्स टी बेल्ट में भी माइग्रेंट आदिवासियों का शोषण हुआ, जहां वे मलेरिया प्रभावित इलाकों में न्यूनतम मजदूरी पर काम करते थे। बंगाल में इंडिगो प्लांटेशन्स और झारखंड में माइनिंग ने आदिवासियों को भूमि से विस्थापित किया, जबकि वेस्ट बंगाल के बीरभूम में स्टोन क्रशर्स में आज भी दलित-आदिवासी शोषित हैं। असम के ‘टी ट्राइब्स’ की तरह, इन मामलों में जातीय भेदभाव, भूमि हड़प और आर्थिक शोषण सामान्य था। सोरेन और लिंडा की पहल इन ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने की दिशा में है, जो आदिवासियों को सम्मान और अधिकार दिलाएगी।

सोरेन और लिंडा की जोड़ी झारखंड की राजनीति में आदिवासी सशक्तिकरण का प्रतीक है। उनकी तारीफ इसलिए जरूरी है क्योंकि वे न केवल वर्तमान समस्या सुलझा रहे हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए न्याय का रास्ता प्रशस्त कर रहे हैं। ऐसे नेतृत्व से आदिवासी समुदाय में नई उम्मीद जागी है I

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