अध्यक्ष महोदय. मैं आज इस सदन में आदरणीय चंपई सोरेन जी के विश्वास मत का हिस्सा बन रहा हूं और हमारी पूरी पार्टी और पूरा गठबंधन दल उनको समर्थन करता है. और मैं कहना चाहूंगा 31 जनवरी की जो काली रात, काला अध्याय, देश के लोकतंत्र में नए तरीके से जुड़ा है. 31 तारीख की रात को देश में पहली बार किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी हुई हो, मेरे संज्ञान में नहीं है. ये मुझे लगता है कि यह पहली घटना है. और मुझे लगता है कि इस घटना को अंजाम देने में कहीं ना कहीं राजभवन भी शामिल रहा है. और जिस तरीके से ये घटना घटित हुई है, मैं बहुत आश्चर्यचकित हूं, इसलिए कि मैं एक आदिवासी वर्ग से आता हूं. नियम कायदे कानून की जानकारी का थोड़ा अभाव रहता है. बौधिक क्षमता हमारे विपक्ष के बराबर नहीं है. लेकिन सही गलत की समझ तो हर इंसान रखता है और हर जानवर भी रखता है.
अध्यक्ष महोदय, बड़े सुनियोजित तरीके से बड़े लंबे समय से 2022 से ही 31 तारीख की घटना की पटकथा लिखी जा रही थी. बड़े ही सुनियोजित तरीके से उस पकवान को बहुत धीमी आंच में पकाया जा रहा था. लेकिन इनका पकवान पकने को तैयार नहीं है. लेकिन ऐन केन प्रकारेण इस आधी-अधूरी पकवान को अपने लिए परोसा और बड़े ही सुनियोजित तरीके से मुझे अपनी गिरफ्त में लिया है. और आज कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि बाबा भीम राव अंबेडकर जी का जो सपना था, सभी वर्ग के लोग एक समान प्लेटफॉर्म पड़ आएं. बराबरी की राह पर चलें. मुझे लगता है कि जिस तरीके से बाबा भीम राव अंबेडकर को भी अपना समाज छोड़ कर बौध धर्म अपनाना पड़ा, वैसे ही आदिवासी समाज को करने की तैयारी हो रही है. बड़ा सुनियोजित तरीके से, अनेकों काल खंड को देखेंगे, तो आदिवासी, दलित, पिछड़ों पर जो अत्याचार हुए है, वह नए-नए रूप में, नए-नए शक्ल में दिखते रहे हैं. आज उसी का जीता जागता उदाहरण 31 जनवरी की रात देखने को मिला है. और आज कहीं ना कहीं इन वर्गों के प्रति जो हमारे सत्ता (केंद्र) पक्ष की घृणाएं हैं, ना जाने इनकी घृणाएं, इनको इतनी ताकत कहां से मिलती है, ये हमारे समझ से परे है. इतनी घृणा, इतना द्वेष आदिवासी, दलितों व पिछ़ड़ों के प्रति. इससे अंदाजा होगा कि इन्हीं के पाले हुए तंत्र, यह कहते शर्माते नहीं कि ये जंगल में थे, तो जंगल में ही इनको रहना चाहिए. हम जंगल से बाहर आ गए, इनके बराबर बैठ गए, तो इनके कपड़े मैले होने लगते हैं. ये हमें अछूत देखते हैं. और इन्हीं विडंबना को तोड़ने के लिए हमने एक प्रयास किया था. क्योंकि झारखंड आदिवासी दलित पिछड़ा राज्य है. इन सबों को आगे बढ़ने का, इनका मार्ग प्रशस्त करने में हमने कोई कमी नहीं छोड़ी. इनका बस चले तो हम अब भी जंगल में जा करके वही 50-100 साल पुरानी जिंदगी जिएं. और मुझे इसका आभास था. जो इनके अंदर छिपी कुंठा है, वो आए दिन ये बयां करती थी. इनके आचरणों से, इनके बयानों से. लेकिन हमने हार नहीं मानी है अध्यक्ष महोदय. इनको लगता है कि मुझे जेल की सलाखों के अंदर डालकर ये अपने मंसूबों में सफल हो जाएंगे. ये झारखंड है अध्यक्ष महोदय. यह देश का ऐसा राज्य है, जहां हर कोने पर आदिवासी, दलित पिछड़े वर्गों से अनगिनत सिपाहियों ने अपनी कुर्बानी देकर यहां के आदिवासी-दलित की जान बचायी. देश की आजादी के ये लोग सपने भी नहीं देखते थे, तब से आदिवासी अपने हक अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. ये तो बहुत बाद में आये, लेकिन बौधिक संपन्नता, आर्थिक संपन्नता वाले ये लोग आज तक देश का गांधी टोपी नहीं पहना.
अध्यक्ष महोदय, ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स, जिनको देश के विशेष और काफी संवेदनशील व्यवस्थाएं कही जाती है. जहां करोड़ों रुपये, 12 लाख, 14 लाख रुपया डकार कर इनके सहयोगी विदेश में जाकर बैठे हुए हैं, उनका एक बाल बाका करने की औकात नहीं. इनके पास औकात है, देश के आदिवासी दलित पिछड़े के ऊपर और बेगुनाहों के उपर अत्याचार करने का.
आज मुझे किस लिए अरेस्ट किया गया. 8.5 एकड़ जमीन के घोटाले के लिए. अगर है हिम्मत तो कागज पटक कर दिखाएं, कि 8.5 एकड़ का जमीन हेमंत सोरेन के नाम पर है. अगर होगा तो मैं उस दिन से राजनीति से इस्तीफा दे दूंगा. जब ये राजनीतिक रूप से नहीं सकते हैं. तो ऐसे ही बैकडोर से, पीठ पर हमला करते हैं.
अध्यक्ष महोदय, मैं आंसू नहीं बहाउंगा. आंसू वक्त के लिए रखूंगा. आप लोगों के लिए आंसुओं का कोई महत्व नहीं है. आदिवासी पिछड़ों के आंसुओं का. वक्त आने पर इनके एक-एक सवालों का जवाब, इनके षड्यंत्र का जवाब वक्त आने पर बड़े माकूल तरीके से दिया जायेगा. लेकिन दुर्भाग्य है इस राज्य का, तथाकथित राज्य के कुछ लोग, जो ऐसे सामंती विचार वालों के चरणों में झुक कर उनकी सेवा और पूजा-अर्चना में लगे हैं. नहीं तो इस राज्य की इतनी दुर्दशा नहीं होती. राज्य अलग हुए 24 साल हो गए. किसने सबसे अधिक राज किया इस राज्य में. ये मुझे बोलने की जरुरत नहीं है. किसी को बताने की भी जरुरत नहीं. सब अपने गिरेबा में देखे. सबको पता है. कौन कहां बैठा. किसने क्या काम किया. घोटाले इनको 2019 से ही नजर आ रहे. 2000 से नजर नहीं आ रहे. आज ये नहीं चाहते देश का आदिवासी, दलित, पिछड़ा अल्पसंख्यक देश के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचे. ये नहीं चाहते कि ये जज बनें, ये नहीं चाहते कि ये राजनेता बनें. आइएएस-आईपीएस बनें.
इन्हीं के साथ बैठे लोग हैं. इन लोगों ने भी आदिवासी को नेता बनाया था. लेकिन बताएं. कितने ने पांच साल पूरा किया. मुझे यह पता था कि मुझे भी पांच साल पूरा नहीं करने देंगे. रोड़े अटकायेंगे. और नतीजा यह हुआ. कुछ भी करो पांच साल पूरे नहीं होने चाहिए. रिकॉर्ड में नहीं दिखना चाहिए. रजिस्टर में नहीं दिखना चाहिए. बस यही.
अध्यक्ष महोदय, हमलोगों ने सर झुका करके चलना नहीं सीखा. यही खासियत है आदिवासियों की. लेकिन होता सरसो में ही भूत है, तो भूत भागेगा कहां. यहां कुछ भूत ऐसे भी है, इसके कारण ये परेशानियां होती है.
जब-जब हम लोगों ने अलग राज्य की परिकल्पना की, तब भी इन लोगों ने हंसी उड़ायी कि आदिवासी अलग राज्य लेगा. जब हम सत्ता में आए, कहा आदिवासी सत्ता चलायेगा. कुछ ही दिन में गिर जायेगा. मैं हवाई जहाज में चलता था, उसमें भी इनको तकलीफ, मैं फाईव स्टार में रूकता था, इनको तकलीफ, मैं बीएमडव्यू में चलता था, उसमें भी इनको तकलीफ. क्या कहावत है कि हम करे तो गुनाह ये करो तो क्या…. खैर छोड़िये.
अध्यक्ष महोदय, बड़ा विचित्र स्थिति है, आज जो स्थिति है. पूरे देश के पैमाने पर आदिवासी दलित पिछड़ा सुरक्षित नहीं है. विशेष कर झारखंड में. यहां की खनिज संपदाओं पर वर्षों से इनकी गिद्ध दृष्टि है और आगे भी रहेगी. वो तो हम थे, इनको बहुत फूंक-फूंक कर उनको आगे बढ़ना पड़ता था. ये खुला दरवाजा के आदि हो चुके हैं. इनको कोई नहीं रोक टोक कर सकता. जो इनके सामने आयेगा, उसे इसी तरीके के अंजाम से गुजरना पड़ेगा. इनको लगता है, इससे झारखंड के लोग घबरा जायेंगे. यह आप लोगों की बहुत बड़ा भूल है और इतनी बड़ी भूल होगी कि झारखंड का इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा.
आज जो षड्यंत्र का जो पैमाना है, वो इस कदर, बड़े इसके दायरे बने है, कानून के अंदर रह करके गैर कानूनी कार्य कैसे करना हो, वो किसी से सीखना हो तो इन लोगों से सीखिए और इनके संस्थाओं से सीखिए. मैं तो कहता हूं और फिर से कहता हूं कि अपने ईडी और सीबीआई से कहिये, कोर्ट में दस्तावेज पेश करें. एक भी दस्तावेज आप लोग दिखा दें कि हमने 8.5 एकड़ जमीन हड़पी है, तो मैं उसी दिन राजनीति से संन्यास क्या झारखंड छोड़ करके चला जाउंगा. ये उनको नहीं मिला तो मेरे परिवार, बीवी, बच्चों के खाता-बही ढ़ूंढ़ने में लग गए. ऐ पैसा कहां से आया.
अध्यक्ष महोदय, असमानताएं देखिए, इसी सदन में कि सरकार के द्वारा दिया जाने वाला ऋृण आदिवासी विधायकों को कितने दिनों के लिए मिलता है और गैर आदिवासियों को कितने सालों के लिए मिलता है. इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है. ये बहुत लंबी लड़ाई है. आज जिस तरह से बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है. सामाजिक व्यवस्था में भी यही कहानी है. एक बड़ी व्यवस्था, छोटी व्यवस्था को खा जाने का हर भरसक प्रयास करती है.
प्रभु राम का प्राण-प्रतिषठा हुआ 22 जनवरी को. रामराज्य आ गया. पहला कदम बिहार में पड़ा. बेचारा एक पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति, क्या हाल हुआ आप सब जानते हैं. दूसरा कदम झारखंड पर पड़ा. एक आदिवासी मुख्यमंत्री को निगलने का प्रयास. क्योंकि इस आदिवासी मुख्यमंत्री के शरीर में हड्डियां कुछ अधिक है. इसलिए उस हड्डी को निकालने का प्रयास, ईडी लगी हुई है. लेकिन इतना आसान नहीं है. जिस दिन गले में फंस गया. पूरा का पूरा अंतरी फाड़ कर निकलेगा. इस वजह संभल कर खाने की कोशिश कीजियेगा.
मुझे कोई गम नहीं कि मुझे आज ईडी ने पकड़ा है. जिस तरीके से बंधु दा का सदस्यता लिया. कि वो आज चुनाव नहीं लड़ सकते. हो सकता है ये मेरा भी यही हस्र करें. कोई गम नहीं. सत्ता लोलुपता के लिए हम लोग कभी नहीं आए अध्यक्ष महोदय. लेकिन ये बात मैं सदन में कहना चाहूंगा कि झामुमो का उदय झारखंड के मान-सम्मान व स्वाभिमान को बचाने के लिए हुआ है. और इसके प्रति जो भी बुरी नजर डालेगा. उसको हम मुंहतोड़ जवाब देंगे. चाहे व राजनीतिक रूप से, कानूनी रूप से हो या चाहे किसी भी जंग के मैदान में हो. ये हमारा संकल्प है. ना हम पीछे हटे हैं, ना हमलोगों ने पीठ दिखायी है.
इसलिए अध्यक्ष महोदय, मुझे तो कोर्ट का आदेश है कि मीडिया के सामने या बाहर वक्तव्य नहीं देना है. हमने ईडी वाले से पूछा कि क्या सदन में भी बात नहीं रखनी है. उन्होंने ये भी कहा कि नहीं सदन में भी नहीं. हमने उनसे कहा है कि आईए, स्पीकर साहेब के चैंबर में बैठ जाइए. वहां से आदेश दीजिये, तब हम मानेंगे. ये स्थिति हो गई है अध्यक्ष महोदय. अब उस दिन का इंतजार है. अभी गवर्नर साहेब का कोरम पूरा हो गया. राष्ट्रपति भवन से कब अरेस्ट होंगे. लोकसभा-राज्यसभा से लोग कब अरेस्ट होंगे. डेढ़ सौ 200 सांसदों का निलंबन, क्या यह इतिहास के सुनहरे अक्षरों से लिखा जायेगा. बड़ी विचित्र स्थिति है. और मैं यह कहना चाहूंगा, विशेष कर आदिवासी, पिछड़ा दलित भाईयों से. आप तैयार हो जाएं. अब शोषण की एक नई परिभाषा गढ़ने जा रही है. अगर आपको आपने कमजोर किया तो आने वाली पीढ़ी आपको कभी माफ नहीं करेगी.
राज्यपाल महोदय आए और 32 पेज का इन्होंने अभिभाषण पढ़ा. हमलोग लाख चिल्लाते कि अभिभाषण पढ़ कर क्या होगा, जब देश में लोकतंत्र ही नहीं बचेगा. आज हर चीज पिछले दरवाजे से हो रहा है.
खैर इतना तो हमलोगों को इतना ज्ञान बुद्धि तो है नहीं. पर समय से बलवान तो कोई नहीं है. और वक्त फिर घूमेगा और फिर हम आपके सामने उपस्थित होंगे. और इतनी मजबूती के साथ उपस्थित होंगे कि जो षड्यंत्र कर रहे हैं, वो षड्यंत्र आपके धरे के धरे रहे और इस देश राज्य के आदिवासी दलितों पिछ़ड़ों के लिए जो संघर्ष करना पड़ेगा. करते रहेंगे, करते रहेंगे.