न्यूज़ चैनल पर उर्दू बोलने की इजाज़त नहीं है, मानो उर्दू कोई बाहर से आयी हुई पराई ज़बान हो। वही उर्दू… जो इसी मिट्टी से निकली, यहीं पली-बढ़ी, और जिसने गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपनी शायरी और अदब से सींचा।

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मोदीजी को क्या हो गया है भाई

न्यूज़ चैनल पर उर्दू बोलने की इजाज़त नहीं है, मानो उर्दू कोई बाहर से आयी हुई पराई ज़बान हो। वही उर्दू… जो इसी मिट्टी से निकली, यहीं पली-बढ़ी, और जिसने गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपनी शायरी और अदब से सींचा।

लेकिन हैरत देखिए—दुनिया को दिखाने के लिए, वही लोग बड़े गर्व से अरबी, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच और जाने किन-किन भाषाओं में ट्वीट करते हैं।

यानी उर्दू, जो हमारे अपने घर की भाषा है, उससे नफ़रत; और बाहर की भाषाओं को गले लगाने में कोई हिचकिचाहट नहीं।

अब जरा सोचिए, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गाज़ा के संघर्ष को ख़त्म करने की “व्यापक योजना” की घोषणा करते हैं, तो उसका स्वागत बड़े-बड़े लफ़्ज़ों में किया जाता है। कहा जाता है कि यह योजना फ़लस्तीन और इस्राइल दोनों के लिए, और पूरे पश्चिम एशिया के लिए शांति, सुरक्षा और स्थायी विकास का रास्ता खोलेगी। और उम्मीद जताई जाती है कि सभी पक्ष इस पहल के पीछे खड़े हों।

लेकिन सवाल ये है—जब हम वैश्विक मंच पर शांति और एकता की भाषा समझते और बोलते हैं, तो अपने ही मुल्क की ज़बान उर्दू क्यों गले नहीं उतरती?
क्या शांति सिर्फ़ कूटनीति के शब्दकोश में अच्छी लगती है, और मोहब्बत की ज़बान हमें खटकती है?

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