केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट झारखंड के प्रति उसकी असंवेदनशीलता और भेदभावपूर्ण रवैये को एक बार फिर उजागर करता है। यह कोई पहली बार नहीं है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार पड़ोसी भाजपा-शासित राज्यों पर विशेष मेहरबानी दिखाई जा रही है, जबकि झारखंड को हर बजट में उपेक्षा का शिकार बनाया जा रहा है। यह सौतेला व्यवहार अब छिपा नहीं रहा, जनता सब देख रही है और समझ रही है।
झारखंड जैसे खनिज-संपन्न, श्रमशील और योगदान देने वाले राज्य को न तो बकाया राशि मिल रही है, न ही उसके विकास की वास्तविक जरूरतों को बजट में जगह दी जा रही है। कोल कंपनियों के पास बकाया 1.36 लाख करोड़ रुपये आज भी लंबित हैं। मनरेगा के 60:40 खर्च अनुपात से राज्य पर जो अतिरिक्त बोझ पड़ा है, उसकी भरपाई के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया। जीएसटी युक्तिकरण से झारखंड को होने वाली हजारों करोड़ रुपये की वार्षिक क्षति पर केंद्र पूरी तरह मौन है।
कृषि, सिंचाई, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना जैसे अहम क्षेत्रों में झारखंड को नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि चुनावी समीकरणों के आधार पर चुनिंदा राज्यों को भारी पैकेज देकर भेदभाव नीति अपनाई गई। न नई रेल लाइन, न नई ट्रेन, न ही सीमांत किसानों, मजदूरों, महिलाओं और युवाओं के लिए कोई ठोस पहल। यह बजट झारखंड के लिए निराशा का दस्तावेज़ है।
केंद्र सरकार चाहे जितने बड़े-बड़े वादे करे, हकीकत यही है कि झारखंड के साथ अन्याय लगातार जारी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा इस भेदभाव का पुरजोर विरोध करता है और केंद्र से मांग करता है कि वह राज्यों के साथ समान व्यवहार करे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता लोकतांत्रिक तरीके से इसका जवाब जरूर देगी।
